लघु कथाएं

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Thursday, May 7, 2015

अनमोल भेंट

5:25 AM
रवीन्द्रनाथ टैगोर
रायचरण बारह वर्ष की आयु से अपने मालिक का बच्‍चा खिलाने पर नौकर हुआ था। उसके पश्चात् काफ़ी समय बीत गया। नन्हा बच्‍चा रायचरण की गोद से निकलकर स्कूल में प्रविष्ट हुआ, स्कूल से कॉलिज में पहुँचा, फिर एक सरकारी स्थान पर लग गया। किन्तु रायचरण अब भी बच्‍चा खिलाता था, यह बच्‍चा उसकी गोद के पाले हुए अनुकूल बाबू का पुत्र था।

बच्‍चा घुटनों के बल चलकर बाहर निकल जाता। जब रायचरण दौड़कर उसको पकड़ता तो वह रोता और अपने नन्हे-नन्हे हाथों से रायचरण को मारता।

रायचरण हंसकर कहता- हमारा भैया भी बड़ा होकर जज साहब बनेगा- जब वह रायचरण को चन्ना कहकर पुकारता तो उसका हृदय बहुत हर्षित होता। वह दोनों हाथ पृथ्वी पर टेककर घोड़ा बनता और बच्‍चा उसकी पीठ पर सवार हो जाता।

इन्हीं दिनों अनुकूल बाबू की बदली परयां नदी के किनारे एक ज़िले में हो गई। नए स्थान की ओर जाते हुए कलकत्ते से उन्होंने अपने बच्चे के लिए मूल्यवान आभूषण और कपड़ों के अतिरिक्त एक छोटी-सी सुन्दर गाड़ी भी ख़रीदी।

वर्षा ऋतु थी। कई दिनों से मूसलाधर वर्षा हो रही थी। ईश्वर-ईश्वर करते हुए बादल फटे। संध्या का समय था। बच्चे ने बाहर जाने के लिए आग्रह किया। रायचरण उसे गाड़ी में बिठाकर बाहर ले गया। खेतों में पानी खूब भरा हुआ था। बच्चे ने फूलों का गुच्छा देखकर ज़िद की, रायचरण ने उसे बहलाना चाहा किन्तु वह न माना। विवश रायचरण बच्चे का मन रखने के लिए घुटनों-घुटनों पानी में फूल तोड़ने लगा। कई स्थानों पर उसके पांव कीचड़ में बुरी तरह धंस गये। बच्‍चा तनिक देर मौन गाड़ी में बैठा रहा, फिर उसका ध्यान लहराती हुई नदी की ओर गया। वह चुपके से गाड़ी से उतरा। पास ही एक लकड़ी पड़ी थी, उठा ली और भयानक नदी के तट पर पहुंचकर उसकी लहरों से खेलने लगा। नदी के शोर में ऐसा मालूम होता था कि नदी की चंचल और मुंहजोर जल-परियां सुन्दर बच्चे को अपने साथ खेलने के लिए बुला रही हैं।

रायचरण फूल लेकर वापस आया तो देखा गाड़ी ख़ाली है। उसने इधर-उधर देखा, पैरों के नीचे से धरती निकल गई। पागलों की भांति चहुंओर देखने लगा। वह बार-बार बच्चे का नाम लेकर पुकारता था लेकिन उत्तर में 'चन्ना' की मधुर ध्वनि न आती थी।

चारों ओर अंधेरा छा गया। बच्चे की माता को चिन्ता होने लगी। उसने चारों ओर आदमी दौड़ाये। कुछ व्यक्ति लालटेन लिये हुए नदी के किनारे खोज करने पहुँचे। रायचरण उन्हें देखकर उनके चरणों में गिर पड़ा। उन्होंने उससे प्रश्न करने आरम्भ किये किन्तु वह प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में यही कहता-मुझे कुछ मालूम नहीं।

यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति की यह सम्मति थी कि छोटे बच्चे को परयां नदी ने अपने आंचल में छिपा लिया है किन्तु फिर भी हृदय में विभिन्न प्रकार की शंकायें उत्पन्न हो रही थीं। एक यह कि उसी संध्या को निर्वासितों का एक समूह नगर से गया था और मां को संदेह था कि रायचरण ने कहीं बच्चे को निर्वासित के हाथों न बेच दिया हो। वह रायचरण को अलग ले गई और उससे विनती करते हुए कहने लगी-रायचरण, तुम मुझसे जितना रुपया चाहो ले लो, किन्तु परमात्मा के लिए मेरी दशा पर तरस खाकर मेरा बच्‍चा मुझको वापस कर दो।

परन्तु रायचरण कुछ उत्तर न दे सका, केवल माथे पर हाथ मारकर मौन हो गया।

स्वामिनी ने क्रोध और आवेश की दशा में उसको घर-से बाहर निकाल दिया। अनुकूल बाबू ने पत्नी को बहुत समझाया किन्तु माता के हृदय से शंकाएं दूर न हुईं। वह बराबर यही कहती रही कि- मेरा बच्‍चा सोने के आभूषण पहने हुए था, अवश्य इसने...

रायचरण अपने गांव वापस चला आया। उसे कोई सन्तान न थी और न ही सन्तान होने की कोई सम्भावना थी। किन्तु साल की समाप्ति पर उसके घर पुत्र ने जन्म लिया; परन्तु पत्नी सूतिका-गृह में ही मर गई। घर में एक विधवा बहन थी। उसने बच्चे के पालन-पोषण का भार अपने ऊपर लिया।

जब बच्‍चा घुटनों के बल चलने लगा, वह घर वालों की नजर बचा कर बाहर निकल जाता। रायचरण जब उसे दौड़कर पकड़ता तो वह चंचलता से उसको मारता। उस समय रायचरण के नेत्रों के सामने अपने उस नन्हें मालिक की सूरत फिर जाती जो परयां नदी की लहरों में लुप्त हो गया था।

बच्चे की जबान खुली तो वह बाप को 'बाबा' और बुआ को 'मामा' इस ढंग से कहता था जिस ढंग से रायचरण का नन्हा मालिक बोलता था। रायचरण उसकी आवाज़ से चौंक उठता। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसके मालिक ने उसके घर में जन्म लिया है।

इस विचार को निर्धारित करने के लिए उसके पास तीन प्रमाण थे। एक तो यह कि वह नन्हे मालिक की मृत्यु के थोड़े ही समय पश्चात् उत्पन्न हुआ। दूसरे यह कि उसकी पत्नी वृध्द हो गई थी और सन्तान-उत्पत्ति की कोई आशा न थी। तीसरे यह कि बच्चे के बोलने का ढंग और उसकी सम्पूर्ण भाव-भंगिमाएं नन्हे मालिक से मिलती-जुलती थीं।

वह हर समय बच्चे की देख-भाल में संलग्न रहता। उसे भय था कि उसका नन्हा मालिक फिर कहीं गायब न हो जाए। वह बच्चे के लिए एक गाड़ी लाया और अपनी पत्नी के आभूषण बेचकर बच्चे के लिए आभूषण बनवा दिये। वह उसे गाड़ी में बिठाकर प्रतिदिन वायु-सेवन के लिए बाहर ले जाता था।

धीरे-धीरे दिन बीतते गये और बच्‍चा सयाना हो गया। परन्तु इस लाड़-चाव में वह बहुत बिगड़ गया था। किसी से सीधे मुंह बात न करता। गांव के लड़के उसे लाट साहब कहकर छेड़ते।

जब लड़का शिक्षा-योग्य हुआ तो रायचरण अपनी छोटी-सी ज़मीन बेचकर कलकत्ता आ गया। उसने दौड़-धूप करके नौकरी खोजी और फलन को स्कूल में दाखिल करवा दिया। उसको पूर्ण विश्वास था कि बड़ा होकर फलन अवश्य जज बनेगा।

होते-होते अब फलन की आयु बारह वर्ष हो गई। अब वह खूब लिख-पढ़ सकता था। उसका स्वास्थ्य अच्छा और सूरत-शक्ल भी अच्छी थी। उसको बनाव- शृंगार की भी बड़ी चिन्ता रहती थी। जब देखो दर्पण हाथ में लिये बाल बना रहा है।

वह अपव्ययी भी बहुत था। पिता की सारी आय व्यर्थ की विलास-सामग्री में व्यय कर देता। रायचरण उससे प्रेम तो पिता की भांति करता था, किन्तु प्राय: उसका बर्ताव उस लड़के से ऐसा ही था जैसे मालिक के साथ नौकर का होता है। उसका फलन भी उसे पिता न समझता था। दूसरी बात यह थी कि रायचरण स्वयं को फलन का पिता प्रकट भी न करता था।

छात्रावास के विद्यार्थी रायचरण के गंवारपन का उपहास करते और फलन भी उन्हीं के साथ सम्मिलित हो जाता।

रायचरण ने ज़मीन बेचकर जो कुछ रुपया प्राप्त किया था वह अब लगभग सारा समाप्त हो चुका था। उसका साधारण वेतन फलन के खर्चों के लिए कम था। वह प्राय: अपने पिता से जेब-खर्च और विलास की सामग्री तथा अच्छे-अच्छे वस्त्रों के लिए झगड़ता रहता था।

आखिर एक युक्ति रायचरण के मस्तिष्क में आई उसने नौकरी छोड़ दी और उसके पास जो कुछ शेष रुपया था फलन को सौंपकर बोला- फलन, मैं एक आवश्यक कार्य से गांव जा रहा हूं, बहुत जल्द वापस आ जाऊंगा। तुम किसी बात से घबराना नहीं।

2

रायचरण सीधा उस स्थान पर पहुंचा जहां अनुकूल बाबू जज के ओहदे पर लगे हुए थे। उनके और कोई दूसरी संतान न थी इस कारण उनकी पत्नी हर समय चिन्तित रहती थी।

अनुकूल बाबू कचहरी से वापस आकर कुर्सी पर बैठे हुए थे और उनकी पत्नी सन्तानोत्पत्ति के लिए बाज़ारू दवा बेचने वाले से जड़ी-बूटियां ख़रीद रही थी।

काफ़ी दिनों के पश्चात् वह अपने वृध्द नौकर रायचरण को देखकर आश्चर्यचकित हुई, पुरानी सेवाओं का विचार करके उसको रायचरण पर तरस आ गया और उससे पूछा- क्या तुम फिर नौकरी करना चाहते हो?

रायचरण ने मुस्कराकर उत्तर दिया- मैं अपनी मालकिन के चरण छूना चाहता हूं।

अनुकूल बाबू रायचरण की आवाज़ सुनकर कमरे से निकल आये। रायचरण की शक्ल देखकर उनके कलेजे का जख्म ताजा हो गया और उन्होंने मुख फेर लिया।

रायचरण ने अनुकूल बाबू को सम्बोधित करके कहा- सरकार, आपके बच्चे को परयां ने नहीं, बल्कि मैंने चुराया था।

अनुकूल बाबू ने आश्चर्य से कहा- तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मेरा बच्‍चा वास्तव में ज़िन्दा है?

उसकी पत्नी ने उछलकर कहा- भगवान के लिए बताओ मेरा बच्‍चा कहां है?

रायचरण ने कहा- आप सन्तोष रखें, आपका बच्‍चा इस समय भी मेरे पास है।

अनुकूल बाबू की पत्नी ने रायचरण से अत्यधिक विनती करते हुए कहा- मुझे बताओ।

रायचरण ने कहा- मैं उसे परसों ले आऊंगा।

3

रविवार का दिन था। जज साहब अपने मकान में बेचैनी से रायचरण की प्रतीक्षा कर रहे थे। कभी वह कमरे में इधर-उधर टहलने लगते और कभी थोड़े समय के लिए आराम-कुर्सी पर बैठ जाते। आखिर दस बजे के लगभग रायचरण ने फलन का हाथ पकड़े हुए कमरे में प्रवेश किया।

अनुकूल बाबू की घरवाली फलन को देखते ही दीवानों की भांति उसकी ओर लपकी और उसे बड़े ज़ोर से गले लगा लिया। उनके नेत्रों से अश्रुओं का समुद्र उमड़ पड़ा। कभी वह उसको प्यार करती, कभी आश्चर्य से उसकी सूरत तकने लग जाती। फलन सुन्दर था और उसके कपड़े भी अच्छे थे। अनुकूल बाबू के हृदय में भी पुत्र-प्रेम का आवेश उत्पन्न हुआ, किन्तु जरा-सी देर के बार उनके पितृ-प्रेम का स्थान क़ानून भावना ने ले लिया और उन्होंने रायचरण से पूछा-भला इसका प्रमाण क्या है कि यह बच्‍चा मेरा है?

रायचरण ने उत्तर दिया- इसका उत्तर मैं क्या दूं सरकार! इस बात का ज्ञान तो परमात्मा के सिवाय और किसी को नहीं हो सकता कि मैंने ही आपका बच्‍चा चुराया था।

जब अनुकूल बाबू ने देखा कि उनकी पत्नी फलन को कलेजे से लगाये हुए है तो प्रमाण मांगना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त उन्हें ध्यान आया कि इस गंवार को ऐसा सुन्दर बच्‍चा कहां मिल सकता था और झूठ बोलने से क्या लाभ हो सकता है।

सहसा उन्हें अपने वृध्द नौकर की बेध्यानी याद आ गई और क़ानूनी मुद्रा में बोले-रायचरण, अब तुम यहां नहीं रह सकते।

रायचरण ने ठंडी उसांस भरकर कहा-सरकार, अब मैं कहां जाऊं। बूढ़ा हो गया हूं, अब मुझे कोई नौकर भी न रखेगा। भगवान के लिए अपने द्वार पर पड़ा रहने दीजिये।

अनुकूल बाबू की पत्नी बोली- रहने दो, हमारा क्या नुकसान है? हमारा बच्‍चा भी इसे देखकर प्रसन्न रहेगा।

किन्तु अनुकूल बाबू की क़ानूनी नस भड़की हुई थी। उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया-नहीं, इसका अपराध बिल्कुल क्षमा नहीं किया जा सकता।

रायचरण ने अनुकूल बाबू के पांव पकड़ते हुए कहा- सरकार, मुझे न निकालिए, मैंने आपका बच्‍चा नहीं चुराया था बल्कि परमात्मा ने चुराया था।

अनुकूल बाबू को गंवार की इस बात पर और भी अधिक क्रोध आ गया। बोले-नहीं, अब मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकता। तुमने मेरे साथ कृतघ्नता की है।

रायचरण ने फिर कहा- सरकार, मेरा कुछ अपराध नहीं।

अनुकूल बाबू त्यौरियों पर बल डालकर कहने लगे- तो फिर किसका अपराध है?

रायचरण ने उत्तर दिया- मेरे भाग्य का।

परन्तु शिक्षित व्यक्ति भाग्य का अस्तित्व स्वीकार नहीं कर सकता।

फलन को जब मालूम हुआ कि वह वास्तव में एक धनी व्यक्ति का पुत्र है तो उसे भी रायचरण की इस चेष्टा पर क्रोध आया, कि उसने इतने दिनों तक क्यों उसे कष्ट में रखा। फिर रायचरण को देखकर उसे दया भी आ गई और उसने अनुकूल बाबू से कहा- पिताजी, इसको क्षमा कर दीजिए। यदि आप इसको अपने साथ नहीं रखना चाहते तो इसकी थोड़ी पेंशन कर दें।

इतना सुनने के बाद रायचरण अपने बेटे को अन्तिम बार देखकर अनुकूल बाबू की कोठी से निकलकर चुपचाप कहीं चला गया।

महीना समाप्त होने पर अनुकूल बाबू ने रायचरण के गांव कुछ रुपया भेजा किन्तु मनीआर्डर वापस आ गया क्योंकि गांव में अब इस नाम का कोई व्यक्ति न था।

Wednesday, May 6, 2015

भिखारिन

11:30 PM
रवीन्द्रनाथ टैगोर
अन्धी प्रतिदिन मन्दिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी होती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह अपना हाथ फैला देती और नम्रता से कहती- ''बाबूजी, अन्धी पर दया हो जाए।''

वह जानती थी कि मन्दिर में आने वाले सहृदय और श्रध्दालु हुआ करते हैं। उसका यह अनुमान असत्य न था। आने-जाने वाले दो-चार पैसे उसके हाथ पर रख ही देते। अन्धी उनको दुआएं देती और उनको सहृदयता को सराहती। स्त्रियां भी उसके पल्ले में थोड़ा-बहुत अनाज डाल जाया करती थीं।

प्रात: से संध्या तक वह इसी प्रकार हाथ फैलाए खड़ी रहती। उसके पश्चात् मन-ही-मन भगवान को प्रणाम करती और अपनी लाठी के सहारे झोंपड़ी का पथ ग्रहण करती। उसकी झोंपड़ी नगर से बाहर थी। रास्ते में भी याचना करती जाती किन्तु राहगीरों में अधिक संख्या श्वेत वस्त्रों वालों की होती, जो पैसे देने की अपेक्षा झिड़कियां दिया करते हैं। तब भी अन्धी निराश न होती और उसकी याचना बराबर जारी रहती। झोंपड़ी तक पहुंचते-पहुंचते उसे दो-चार पैसे और मिल जाते। 

झोंपड़ी के समीप पहुंचते ही एक दस वर्ष का लड़का उछलता-कूदता आता और उससे चिपट जाता। अन्धी टटोलकर उसके मस्तक को चूमती। बच्चा कौन है? किसका है? कहां से आया? इस बात से कोई परिचय नहीं था। पांच वर्ष हुए पास-पड़ोस वालों ने उसे अकेला देखा था। इन्हीं दिनों एक दिन संध्या-समय लोगों ने उसकी गोद में एक बच्चा देखा, वह रो रहा था, अन्धी उसका मुख चूम-चूमकर उसे चुप कराने का प्रयत्न कर रही थी। वह कोई असाधारण घटना न थी, अत: किसी ने भी न पूछा कि बच्चा किसका है। उसी दिन से यह बच्चा अन्धी के पास था और प्रसन्न था। उसको वह अपने से अच्छा खिलाती और पहनाती।

अन्धी ने अपनी झोंपड़ी में एक हांडी गाड़ रखी थी। संध्या-समय जो कुछ मांगकर लाती उसमें डाल देती और उसे किसी वस्तु से ढांप देती। इसलिए कि दूसरे व्यक्तियों की दृष्टि उस पर न पड़े। खाने के लिए अन्न काफी मिल जाता था। उससे काम चलाती। पहले बच्चे को पेट भरकर खिलाती फिर स्वयं खाती। रात को बच्चे को अपने वक्ष से लगाकर वहीं पड़ रहती। प्रात:काल होते ही उसको खिला-पिलाकर फिर मन्दिर के द्वार पर जा खड़ी होती।

2
काशी में सेठ बनारसीदास बहुत प्रसिध्द व्यक्ति हैं। बच्चा-बच्चा उनकी कोठी से परिचित है। बहुत बड़े देशभक्त और धर्मात्मा हैं। धर्म में उनकी बड़ी रुचि है। दिन के बारह बजे तक सेठ स्नान-ध्यान में संलग्न रहते। कोठी पर हर समय भीड़ लगी रहती। कर्ज के इच्छुक तो आते ही थे, परन्तु ऐसे व्यक्तियों का भी तांता बंधा रहता जो अपनी पूंजी सेठजी के पास धरोहर रूप में रखने आते थे। सैकड़ों भिखारी अपनी जमा-पूंजी इन्हीं सेठजी के पास जमा कर जाते। अन्धी को भी यह बात ज्ञात थी, किन्तु पता नहीं अब तक वह अपनी कमाई यहां जमा कराने में क्यों हिचकिचाती रही।

उसके पास काफी रुपये हो गए थे, हांडी लगभग पूरी भर गई थी। उसको शंका थी कि कोई चुरा न ले। एक दिन संध्या-समय अन्धी ने वह हांडी उखाड़ी और अपने फटे हुए आंचल में छिपाकर सेठजी की कोठी पर पहुंची।

सेठजी बही-खाते के पृष्ठ उलट रहे थे, उन्होंने पूछा- ''क्या है बुढ़िया?''

अंधी ने हांडी उनके आगे सरका दी और डरते-डरते कहा- ''सेठजी, इसे अपने पास जमा कर लो, मैं अंधी, अपाहिज कहां रखती फिरूंगी?''

सेठजी ने हांडी की ओर देखकर कहा-''इसमें क्या है?''

अन्धी ने उत्तर दिया- ''भीख मांग-मांगकर अपने बच्चे के लिए दो-चार पैसे संग्रह किये हैं, अपने पास रखते डरती हूं, कृपया इन्हें आप अपनी कोठी में रख लें।''

सेठजी ने मुनीम की ओर संकेत करते हुए कहा- ''बही में जमा कर लो।'' फिर बुढ़िया से पूछा-''तेरा नाम क्या है?''

अंधी ने अपना नाम बताया, मुनीमजी ने नकदी गिनकर उसके नाम से जमा कर ली और वह सेठजी को आशीर्वाद देती हुई अपनी झोंपड़ी में चली गई।

3
दो वर्ष बहुत सुख के साथ बीते। इसके पश्चात् एक दिन लड़के को ज्वर ने आ दबाया। अंधी ने दवा-दारू की, झाड़-फूंक से भी काम लिया, टोने-टोटके की परीक्षा की, परन्तु सम्पूर्ण प्रयत्न व्यर्थ सिध्द हुए। लड़के की दशा दिन-प्रतिदिन बुरी होती गई, अंधी का हृदय टूट गया, साहस ने जवाब दे दिया, निराश हो गई। परन्तु फिर ध्यान आया कि संभवत: डॉक्टर के इलाज से फायदा हो जाए। इस विचार के आते ही वह गिरती-पड़ती सेठजी की कोठी पर आ पहुंची। सेठजी उपस्थित थे।

अंधी ने कहा- ''सेठजी मेरी जमा-पूंजी में से दस-पांच रुपये मुझे मिल जायें तो बड़ी कृपा हो। मेरा बच्चा मर रहा है, डॉक्टर को दिखाऊंगी।''

सेठजी ने कठोर स्वर में कहा- ''कैसी जमा पूंजी? कैसे रुपये? मेरे पास किसी के रुपये जमा नहीं हैं।''

अंधी ने रोते हुए उत्तर दिया- ''दो वर्ष हुए मैं आपके पास धरोहर रख गई थी। दे दीजिए बड़ी दया होगी।''

सेठजी ने मुनीम की ओर रहस्यमयी दृष्टि से देखते हुए कहा- ''मुनीमजी, जरा देखना तो, इसके नाम की कोई पूंजी जमा है क्या? तेरा नाम क्या है री?''

अंधी की जान-में-जान आई, आशा बंधी। पहला उत्तर सुनकर उसने सोचा कि सेठ बेईमान है, किन्तु अब सोचने लगी सम्भवत: उसे ध्यान न रहा होगा। ऐसा धर्मी व्यक्ति भी भला कहीं झूठ बोल सकता है। उसने अपना नाम बता दिया। उलट-पलटकर देखा। फिर कहा- ''नहीं तो, इस नाम पर एक पाई भी जमा नहीं है।''

अंधी वहीं जमी बैठी रही। उसने रो-रोकर कहा- ''सेठजी, परमात्मा के नाम पर, धर्म के नाम पर, कुछ दे दीजिए। मेरा बच्चा जी जाएगा। मैं जीवन-भर आपके गुण गाऊंगी।''

परन्तु पत्थर में जोंक न लगी। सेठजी ने क्रुध्द होकर उत्तर दिया- ''जाती है या नौकर को बुलाऊं।''

अंधी लाठी टेककर खड़ी हो गई और सेठजी की ओर मुंह करके बोली- ''अच्छा भगवान तुम्हें बहुत दे।'' और अपनी झोंपड़ी की ओर चल दी।

यह अशीष न था बल्कि एक दुखी का शाप था। बच्चे की दशा बिगड़ती गई, दवा-दारू हुई ही नहीं, फायदा क्यों कर होता। एक दिन उसकी अवस्था चिन्ताजनक हो गई, प्राणों के लाले पड़ गये, उसके जीवन से अंधी भी निराश हो गई। सेठजी पर रह-रहकर उसे क्रोध आता था। इतना धनी व्यक्ति है, दो-चार रुपये दे देता तो क्या चला जाता और फिर मैं उससे कुछ दान नहीं मांग रही थी, अपने ही रुपये मांगने गई थी। सेठजी से घृणा हो गई।

बैठे-बैठे उसको कुछ ध्यान आया। उसने बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया और ठोकरें खाती, गिरती-पड़ती, सेठजी के पास पहुंची और उनके द्वार पर धरना देकर बैठ गई। बच्चे का शरीर ज्वर से भभक रहा था और अंधी का कलेजा भी।

एक नौकर किसी काम से बाहर आया। अंधी को बैठा देखकर उसने सेठजी को सूचना दी, सेठजी ने आज्ञा दी कि उसे भगा दो।

नौकर ने अंधी से चले जाने को कहा, किन्तु वह उस स्थान से न हिली। मारने का भय दिखाया, पर वह टस-से-मस न हुई। उसने फिर अन्दर जाकर कहा कि वह नहीं टलती।

सेठजी स्वयं बाहर पधारे। देखते ही पहचान गये। बच्चे को देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि उसकी शक्ल-सूरत उनके मोहन से बहुत मिलती-जुलती है। सात वर्ष हुए तब मोहन किसी मेले में खो गया था। उसकी बहुत खोज की, पर उसका कोई पता न मिला। उन्हें स्मरण हो आया कि मोहन की जांघ पर एक लाल रंग का चिन्ह था। इस विचार के आते ही उन्होंने अंधी की गोद के बच्चे की जांघ देखी। चिन्ह अवश्य था परन्तु पहले से कुछ बड़ा। उनको विश्वास हो गया कि बच्चा उन्हीं का है। परन्तु तुरन्त उसको छीनकर अपने कलेजे से चिपटा लिया। शरीर ज्वर से तप रहा था। नौकर को डॉक्टर लाने के लिए भेजा और स्वयं मकान के अन्दर चल दिये।

अंधी खड़ी हो गई और चिल्लाने लगी-''मेरे बच्चे को न ले जाओ, मेरे रुपये तो हजम कर गये अब क्या मेरा बच्चा भी मुझसे छीनोगे?''

सेठजी बहुत चिन्तित हुए और कहा-''बच्चा मेरा है, यही एक बच्चा है, सात वर्ष पूर्व कहीं खो गया था अब मिला है, सो इसे कहीं नहीं जाने दूंगा और लाख यत्न करके भी इसके प्राण बचाऊंगा।''

अंधी ने एक जोर का ठहाका लगाया-''तुम्हारा बच्चा है, इसलिए लाख यत्न करके भी उसे बचाओगे। मेरा बच्चा होता तो उसे मर जाने देते, क्यों? यह भी कोई न्याय है? इतने दिनों तक खून-पसीना एक करके उसको पाला है। मैं उसको अपने हाथ से नहीं जाने दूंगी।''

सेठजी की अजीब दशा थी। कुछ करते-धरते बन नहीं पड़ता था। कुछ देर वहीं मौन खड़े रहे फिर मकान के अन्दर चले गये। अन्धी कुछ समय तक खड़ी रोती रही फिर वह भी अपनी झोंपड़ी की ओर चल दी।

दूसरे दिन प्रात:काल प्रभु की कृपा हुई या दवा ने जादू का-सा प्रभाव दिखाया। मोहन का ज्वर उतर गया। होश आने पर उसने आंख खोली तो सर्वप्रथम शब्द उसकी जबान से निकला, ''मां।''

चहुंओर अपरिचित शक्लें देखकर उसने अपने नेत्र फिर बन्द कर लिये। उस समय से उसका ज्वर फिर अधिक होना आरम्भ हो गया। मां-मां की रट लगी हुई थी, डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, सेठजी के हाथ-पांव फूल गये, चहुंओर अंधेरा दिखाई पड़ने लगा।

''क्या करूं एक ही बच्चा है, इतने दिनों बाद मिला भी तो मृत्यु उसको अपने चंगुल में दबा रही है, इसे कैसे बचाऊं?''

सहसा उनको अन्धी का ध्यान आया। पत्नी को बाहर भेजा कि देखो कहीं वह अब तक द्वार पर न बैठी हो। परन्तु वह वहां कहां? सेठजी ने फिटन तैयार कराई और बस्ती से बाहर उसकी झोंपड़ी पर पहुंचे। झोंपड़ी बिना द्वार के थी, अन्दर गए। देखा अन्धी एक फटे-पुराने टाट पर पड़ी है और उसके नेत्रों से अश्रुधर बह रही है। सेठजी ने धीरे से उसको हिलाया। उसका शरीर भी अग्नि की भांति तप रहा था।

सेठजी ने कहा- ''बुढ़िया! तेरा बच्च मर रहा है, डॉक्टर निराश हो गए, रह-रहकर वह तुझे पुकारता है। अब तू ही उसके प्राण बचा सकती है। चल और मेरे...नहीं-नहीं अपने बच्चे की जान बचा ले।''

अन्धी ने उत्तर दिया- ''मरता है तो मरने दो, मैं भी मर रही हूं। हम दोनों स्वर्ग-लोक में फिर मां-बेटे की तरह मिल जाएंगे। इस लोक में सुख नहीं है, वहां मेरा बच्चा सुख में रहेगा। मैं वहां उसकी सुचारू रूप से सेवा-सुश्रूषा करूंगी।''

सेठजी रो दिये। आज तक उन्होंने किसी के सामने सिर न झुकाया था। किन्तु इस समय अन्धी के पांवों पर गिर पड़े और रो-रोकर कहा- ''ममता की लाज रख लो, आखिर तुम भी उसकी मां हो। चलो, तुम्हारे जाने से वह बच जायेगा।''

ममता शब्द ने अन्धी को विकल कर दिया। उसने तुरन्त कहा- ''अच्छा चलो।''

सेठजी सहारा देकर उसे बाहर लाये और फिटन पर बिठा दिया। फिटन घर की ओर दौड़ने लगी। उस समय सेठजी और अन्धी भिखारिन दोनों की एक ही दशा थी। दोनों की यही इच्छा थी कि शीघ्र-से-शीघ्र अपने बच्चे के पास पहुंच जायें।

कोठी आ गई, सेठजी ने सहारा देकर अन्धी को उतारा और अन्दर ले गए। भीतर जाकर अन्धी ने मोहन के माथे पर हाथ फेरा। मोहन पहचान गया कि यह उसकी मां का हाथ है। उसने तुरन्त नेत्र खोल दिये और उसे अपने समीप खड़े हुए देखकर कहा- ''मां, तुम आ गईं।''

अन्धी भिखारिन मोहन के सिरहाने बैठ गई और उसने मोहन का सिर अपने गोद में रख लिया। उसको बहुत सुख अनुभव हुआ और वह उसकी गोद में तुरन्त सो गया।
दूसरे दिन से मोहन की दशा अच्छी होने लगी और दस-पन्द्रह दिन में वह बिल्कुल स्वस्थ हो गया। जो काम हकीमों के जोशान्दे, वैद्यों की पुड़िया और डॉक्टरों के मिक्सचर न कर सके वह अन्धी की स्नेहमयी सेवा ने पूरा कर दिया।

मोहन के पूरी तरह स्वथ हो जाने पर अन्धी ने विदा मांगी। सेठजी ने बहुत-कुछ कहा-सुना कि वह उन्हीं के पास रह जाए परन्तु वह सहमत न हुई, विवश होकर विदा करना पड़ा। जब वह चलने लगी तो सेठजी ने रुपयों की एक थैली उसके हाथ में दे दी। अन्धी ने मालूम किया, ''इसमें क्या है।''

सेठजी ने कहा-''इसमें तुम्हारे धरोहर है, तुम्हारे रुपये। मेरा वह अपराध''

अन्धी ने बात काट कर कहा-''यह रुपये तो मैंने तुम्हारे मोहन के लिए संग्रह किये थे, उसी को दे देना।''

अन्धी ने थैली वहीं छोड़ दी। और लाठी टेकती हुई चल दी। बाहर निकलकर फिर उसने उस घर की ओर नेत्र उठाये उसके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे किन्तु वह एक भिखारिन होते हुए भी सेठ से महान थी। इस समय सेठ याचक था और वह दाता थी।

Wednesday, April 29, 2015

काबुलीवाला

2:10 AM
रवीन्द्रनाथ टैगोर
मेरी पांच बरस की लड़की मिनी से क्षण भर भी बिना बात किये रहा नहीं जाता। संसार में जन्म लेने के बाद भाषा सीखने में उसने एक साल ही लगाया था। उसके बाद से जब तक वह जागती रहती है, उस समय का एक भी क्षण वह खामोश रहकर नष्ट नहीं करती है। उसकी मां कभी कभी धमका कर उसका मुंह बंद कर देती हैं, पर मैं ऎसा नहीं कर पाता। मिनी अगर खामोश रहे तो, तो वह ऎसी अजीब सी लगती है कि मुझसे उसकी चुप्पी ज्यादा देर तक सही नहीं जाती। यही कारण यही है कि मुझसे उसकी बातचीत कुछ ज्यादा उत्साह से चलती है।
सबेरे मैं उपन्यास का सत्रहवां अध्याय लिखने जा ही रहा था कि मिनी ने आकर शुरु कर दिया, "बाबू, रामदयाल दरबान काका को कौवा कह रहा था। वह कुछ नहीं जानता, है न बाबा?"

संसार की भाषाओं की विभिन्नता के बारे में मैं उसे ज्ञान देने ही वाला था कि उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया, "सुनो बाबू, भोला कह रहा था कि आसमान से हांथी सूंड़ से पानी बिखेरता है तभी बारिश होती है। ओ मां, भोला झूठ मूठ ही इतना बकता है! बस बकता ही रहता है, दिन रात बकता रहता है बाबू।"
इस बारे में मेरी राय का जरा भी इंतज़ार किये बिना ही वह अचानक पूंछ बैठी, "क्यों बाबू, अम्मा तुम्हारी कौन लगती है?"

मैंने मन ही मन कहा, "साली" और मुंह से कहा, "मिनी, तू जा, जाकर भोला के साथ खेल। मुझे अभी काम करना है। वह मेरी लिखने की मेज के पास मेरे पैरों के निकट बैठ गई और दोनों घुटने और हांथ हिला हिला कर, फुर्ती से मुंह चला-चलाकर रटने लगी, "आगड़ुम बागड़ुम घोड़ा दुम साजे।" उस समय मेरे उपन्यास के सत्रहवें अध्याय में प्रताप सिंह कंचन माला को लेकर अंधेरी रात में कारागार की ऊंची खिड़की से नीचे नदी के पानी में कूद रहे थे।

मेरा कमरा सड़क के किनारे था। यकायक मिनी अक्को बक्को तीन तिलक्को का खेल छोड़कर खिड़की के पास पहुंची और जोर जोर से पुकारने लगी, "काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला!"

गन्दे से ढीले कपड़े पहने , सिर पर पगड़ी बांधे, कन्धे पर झोली लटकाये और हांथ में अंगूर की दो चार पिटारियां लिये, एक लम्बा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देख मेरी बिटिया रानी के मन में कैसे भाव जगे होंगे यह बताना तो मुश्किल है, पर वह जोर जोर से उसे पुकार रही थी। मैंने सोंचा, अभी कन्धे पर झोली लटकाये एक आफत मेरे सिर पर सवार हो जायेगी और मेरा सत्रहवां अध्याय समाप्त होने से रह जायेगा।

लेकिन मिनी की पुकार पर जैसे ही काबुली ने हंस कर अपना चेहरा घुमाया और मेरे घर की ओर आने लगा, वैसे ही मिनी जान छुड़ाकर अन्दर भागी और लापता हो गई। उसके मन में एक अन्धविश्वास सा जम गया था कि झोली ढूंढने पर एकाध और मिन्नी जैसे जीवित इंसान मिल सकते हैं।

काबुली ने आकर हंसते हुये सलाम किया और खड़ा रहा। मैंने सोंचा, हालांकि प्रताप सिंह और कंचनमाला की दशा बड़े संकट में है, फिर भी इस आदमी को घर बुलाकर कुछ न खरीदना ठीक न होगा।
कुछ चीज़ें खरीदीं। उसके बाद इधर उधर की चर्चा भी होने लगी। अब्दुल रहमान से रूस, अंग्रेज और सीमान्त रक्षा नीति पर बातें होती रहीं।

अन्त में उठते समय उसने पूंछा, "बाबू जी, तुम्हारी लड़की कहां गई?"

मिनी के मन से बेकार का डर दूर करने के लिये मैंने उसे अंदर से बुलवा लिया। वह मुझसे सट कर खड़ी हो गई। सन्देह भरी दृष्टि से काबुली का चेहरा और उसकी झोली की ओर देखती रही। काबुली ने झोली से किशमिश और खुबानी देना चाहा, पर उसने किसी तरह से नहीं लिया। दुगने सन्देह के साथ वह मेरे घुटनों के साथ चिपकी रही। पहला परिचय इसी तरह हुआ।

कुछ दिनों बाद, एक सवेरे किसी जरूरत से घर से बाहर निकला तो देखा, मेरी बिटिया दरवाजे के पास बेंच पर बैठी बेहिचक बातें कर रही है। काबुली उसके पैरों के पास बैठा मुस्कुराता हुआ सुन रहा है, और बीच बीच में प्रसंग के अनुसार अपनी राय भी खिचड़ी भाषा में प्रदर्शित कर रहा है। मिनी के पांच साल की उम्र के अनुभव में बाबू के अलावा ऎसा धैर्य वाला श्रोता शायद ही कभी मिला होगा। फिर देखा उसका छोटा सा आंचल बादाम और किशमिश से भरा हुआ है। मैंने काबुली से कहा, "इसे यह सब क्यों दिया? ऎसा मत करना।" इतना कहकर जेब से एक अठन्नी निकालकर उसे दे दी। उसने बेझिझक अठन्नी लेकर झोली में डाल ली।

घर लौटकर देखा उस अठन्नी को लेकर बड़ा हो हल्ला शुरु हो चुका था।

मिनी की मां एक सफेद चमचमाता गोलाकार पदार्थ हांथ में लेकर मिनी से पूंछ रही थीं, "तुझे अठन्नी कहां से मिली?"

मिनी ने कहा, "काबुली वाले ने दी है।"
उसकी मां बोली, "काबुली वाले से तूने अठन्नी ली क्यों?"
मिनी रुआंसी सी होकर बोली, "मैंने मांगी नहीं, उसने खुद ही देदी।"

मैंने आकर मिनी को उस पास खड़ी विपत्ति से बचाया और बाहर ले आया।

पता चला कि काबुली के साथ मिनी की यह दूसरी ही मुलाकात हो ऎसी बात नहीं है। इस बीच वह रोज़ आता रहा और पिस्ता-बादाम की रिश्वत देकर मिनी के मासूम लोभी दिल पर काफी अधिकार जमा लिया।

इन दिनों मित्रों में कुछ बंधी बंधाई बातें और परिहास होता रहा। जैसे रहमान को देखते ही मेरी लड़की हंसती हुई उससे पूंछती, "काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला! तुम्हारी झोली में क्या है?"

रहमान एक बेमतलब नकियाते हुये कहता, "हांथी।"

यानी उसकी झोली के भीतर हांथी है, यही उसके परिहास का सूक्ष्म सा अर्थ था। अर्थ बहुत ही सूक्ष्म हो, ऎसा तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी इस परिहास में दोनों को बड़ा मजा आता। सर्दियों की भोर में एक सयाने और एक कम उम्र बच्ची की सरल हंसी मुझे भी बड़ी अच्छी लगती।

उन दोनों में एक बात और चल रही थी। रहमान मिनी से कहता, "खोखी, तुम ससुराल कभी मत जाना हां!"

बंगाली परिवार की लड़कियां बचपन से ही ससुराल शब्द से परिचित हो जाती हैं, लेकिन हम लोगों ने थोड़ा आधुनिक होने के कारण मासूम बच्ची को ससुराल के बारे में सचेत नहीं किया था। इसलिये रहमान की बातों का मतलब वह साफ साफ नहीं समझ पाती थी, लेकिन बात का कोई जवाब दिये बिना चुप रह जाना उसके स्वभाव के बिल्कुल विरुद्व था। वह पलटकर रहमान से पूंछ बैठती, "तुम ससुराल जाओगे?"

रहमान काल्पनिक ससुर के प्रति अपना बहुत बड़ा सा घूंसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।"

यह सुनकर मिनी ससुर नाम के किसी अजनबी प्राणी की दुर्दशा की कल्पना कर खूब हंसती।

सर्दियों के उजले दिन थे। प्राचीन काल में इसी समय राजा लोग दिग्विजय करने निकलते थे। मैं कलकत्ता छोड़कर कहीं नहीं गया। शायद इसीलिये मेरा मन संसार-भर में घूमा करता है। जैसे मैं अपने घर के ही किसी कोने में बसा हुआ हूं। बाहर की दुनिया के लिये मेरा मन सदा बेचैन रहता है। किसी देश का नाम सुनते ही मन वहीं दौड़ पड़ता है। किसी विदेशी को देखते ही मेरा मन फौरन किसी नदी पहाड़ जंगल के बीच एक कुटिया का दृश्य देख रहा होता है। उल्लास से भरे एक स्वतन्त्र जीवन का एक चित्र कल्पना में जाग उठता है।

इधर मैं भी इतनी सुस्त प्रकृति यानी कुन्ना किस्म का हूं कि अपना कोना छोड़कर जरा बाहर निकलने पर ही सिर पर बिजली गिरने का सा अनुभव होने लगता है। इसलिये सवेरे अपने छोटे कमरे में मेज के सामने बैठकर काबुली से गप्पें लड़ाकर बहुत कुछ सैर सपाटे का उद्देष्य पूरा कर लिया करता हूं। दोनों ओर ऊबड़ खाबड़, दुर्गम जले हुये, लाल लाल ऊंचे पहाड़ों की माला, बीच में संकरे रेगिस्तानी रास्ते और उन पर सामान से लदे हुये ऊंटो का काफिला चल रहा है। पगड़ी बांधे सौदागर और मुसाफिरों में कोई ऊंट पर तो कोई पैदल चले जा रहे हैं, किसी के हांथ में बरछी है तो किसी के हांथ में पुराने जमाने की चकमक पत्थर से दागी जाने वाली बंदूक। काबुली अपने मेघ गर्जन के स्वर में , खिचड़ी भाषा में अपने वतन के बारे में सुनाता रहता और वह चित्र मेरी आखों के सामने काफिलों के समान गुजरता चला जाता।

मिनी की मां बड़े ही शंकालु स्वभाव की है। रास्ते पर कोई आहट होते ही उसे लगता कि दुनिया भर के शराबी मतवाले होकर हमारे घर की ओर ही चले आ रहे हैं। यह दुनिया हर कहीं चोर डाकू, शराबी, सांप, बाघ, मलेरिया, सुअरों, तिलचट्टों और गोरों से भरी हुई है, यही उसका ख्याल है। इतने दिनों से (हालांकि बहुत ज्यादा दिन नहीं ) दुनिया में रहने के बावजूद उसके मन से यह भय दूर नहीं हुआ। खासतौर से रहमान काबुली के बारे में वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। उस पर खास नज़र रखने के लिये वह मुझसे बार बार अनुरोध करती थी। मैं उसके सन्देह को हंसकर उड़ा देने की कोशिश करता, तो वह मुझसे एक एक करके कई सवाल पूंछ बैठती, "क्या कभी किसी का लड़का चुराया नहीं गया? क्या काबुल में गुलामी प्रथा लागू नहीं है? एक लम्बे चौडे काबुली के लिये एक छोटे से बच्चे को चुरा कर ले जाना क्या बिल्कुल असंभव है?"

मुझे मानना पड़ा कि यह बात बिल्कुल असंभव तो नहीं, पर विश्वास योग्य भी नहीं है। विश्वास करने की शक्ति हरेक में समान नहीं होती, इसलिये मेरी पत्नी के मन में डर बना रह गया। लेकिन सिर्फ इसलिये बिना किसी दोष के रहमान को अपने घर में आने से मैं मना नहीं कर सका।

हर साल माघ के महीनों में रहमान अपने मुल्क चला जाता है। इस समय वह अपने रुपयों की वसूली में बुरी तरह फंसा रहता है। घर-घर दौड़ना पड़ता है, फिर भी वह एक बार आकर मिनी से मिल ही जाता है। देखने में लगता है जैसे दोनों में कोई साजिश चल रही हो। जिस दिन सवेरे नहीं आ पाता उस दिन देखता हूं शाम को आया है। अंधेरे कमरे के कोने में उस ढीला ढाला कुर्ता पायजामा पहने झोली झिंगोली वाले लम्बे तगड़े आदमी को देखकर सचमुच मन में एक आशंका सी होने लगती है। लेकिन जब देखता हूं कि मिनी 'काबुलीवाला काबुलीवाला' कहकर हंसते-हंसते दौड़ आती और अलग-अलग उम्र के दो मित्रों में पुराना सहज परिहास चलने लगता है, तो मेरा हृदय खुशी से भर उठता।

एक दिन सवेरे में अपने छोटे से कमरे में बैठा अपनी किताब के प्रूफ देख रहा था। सर्दियों के दिन खत्म होने से पहले , आज दो तीन दिन से कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। चारों ओर सबके दांत किटकिटा रहे थे। खिड़कियों के रास्ते धूप आकर मेज के नीचे मेरे पैरों पर पड़ रही थी। यह सेंक मुझे बड़ी सुहावनी लग रही थी। सुबह के करीब आठ बजे होंगे। गुलूबंद लपेटे सवेरे सैर को निकलने वाले लोग अपनी सैर समाप्त कर घर लौट रहे थे। इसी समय सड़क पर बड़ा शोर गुल सुनाई पड़ा।

देखा, हमारे रहमान को दो सिपाही बांधे चले आ रहे हैं और उसके पीछे-पीछे तमाशबीन लड़कों का झुन्ड चला अ रहा है। रहमान के कपड़ों पर खून के दाग हैं और एक सिपाही के हांथ में खून से सना हुआ छुरा है। मैंने दरवाजे से बाहर जाकर सिपाहियों से पूंछा कि मामला क्या है।

कुछ उस सिपाही से कुछ रहमान से सुना कि हमारे पड़ोस में एक आदमी ने रहमान से उधार में एक रामपुरी चादर खरीदी थी। कुछ रुपये अब भी उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से वह मुकर गया था। इसी पर बहस होते-होते रहमान ने उसे छुरा भौंक दिया।

रहमान उस झूठे आदमी के प्रति तरह-तरह की गन्दी गालियां बक रहा था कि इतने में 'काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला' कहती हुई मिनी घर से निकल आई।
क्षण भर में रहमान का चेहरा उजली हंसी से खिल उठा। उसके कन्धे पर आज झोली नहीं थी, इसलिये झोली के बारे में दोनों मित्रों की पुरानी चर्चा न छिड़ सकी। मिनी आते ही एकाएक उससे पूंछ बैठी, "तुम ससुराल जाओगे?"
रहमान ने हंस कर कहा, "वहीं तो जा रहा हूं।"

उसे लगा उसके जवाब से मिनी मुस्कुराई नहीं। तब उसने हांथ दिखाते हुये कहा, "ससुर को मारता, पर क्या करूं हांथ बंधे हुये हैं।"

संगीन चोट पहुंचाने के जुर्म में रहमान को कई सालों की कैद की सजा हो गई। कभी उसके बारे में मैं धीरे-धीरे भूल ही गया। हम लोग जब अपने-अपने घरों में प्रतिदिन के कामों में लगे हुये आराम से दिन गुजार रहे थे, तब पहाड़ों पर आजाद घूमने वाला आदमी कैसे साल पर साल जेल की दीवारों के बीच गुजार रहा होगा, यह बात कभी हमारे मन में नहीं आई।

चंचल हृदय मिनी का व्यवहार तो और भी शर्मनाक था, यह बात उसके बाप को भी माननी पड़ेगी। उसने बड़े ही बेलौस ढंग से अपने पुराने मित्र को भुलाकर पहले तो नबी सईस से दोस्ती कर ली, फिर धीरे-धीरे जैसे उसकी उम्र बढने लगी, वैसे-वैसे दोस्तों के बदले एक के बाद एक सहेलियां जुटने लगीं। यहां तक कि वह अब अपने बाबू के लिखने के कमरे में भी दिखाई नहीं देती। मैंने भी एक तरह से उसके साथ कुट्टी कर ली है।

कितने ही वर्ष बीत गये। फिर सर्दियां आ गईं। मेरी मिनी की शादी तय हो गई। दुर्गा पूजा की छुट्टी में ही उसका ब्याह हो जायेगा। कैलाशवासिनी पार्वती के साथ-साथ मेरे घर की आनन्द मयी भी पिता का घर अंधेरा कर पति के घर चली जायेगी।

बड़े ही सुहावने ढंग से आज सूर्योदय हुआ है। बरसात के बाद सर्दियों की नई धुली हुई धूप ने जैसे सुहागे में गलाये हुये साफ और खरे सोने का रंग अपना लिया है। कलकत्ता के गलियारों में आपस में सटी-टूटी ईंटोवाली गन्दी इमारतों पर भी इस धूप की चमक ने एक अनोखी सुन्दरता बिखेर दी है।
हमारे घर पर सवेरा होने से पहले ही शहनाई बज रही है। मुझे लग रहा है, जैसे वह शहनाई मेरे सीने में पसलियों के भीतर रोती हुई बज रही है। उसका करुण भैरवी राग जैसे मेरे सामने खड़ी विछोह की पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ दुनिया भर में फैलाये दे रहा हो। आज मेरी मिनी का ब्याह है।

सवेरे से ही बड़ा शोरशराबा और लोगों का आना-जाना शुरु हो गया। आंगन में बांस बांधकर शामियाना लगाया जा रहा है,मकान के कमरों और बरामदों पर झाड़ लटकाये जाने की टन-टन सुनाई पड़ रही है। गुहार - पुकार का कोई अंत ही नहीं।

मैं अपने पढने-लिखने वाले कमरे में बैठा खर्च का हिसाब-किताब लिख रहा था कि रहमान आकर सलाम करते हुये खड़ा हो गया।

शुरु में मैं उसे पहचान न सका। उसके पास वह झोली नहीं थी और न चेहरे पर चमक थी। अन्त में उसकी मुस्कुराहट देख कर उसे पहचान गया।

"क्यों रहमान, कब आये?" मैंने पूंछा।

उसने कहा, "कल शाम ही जेल से छूटा हूं।"

यह बात मेरे कानों में जैसे जोर से टकराई। किसी कातिल को मैंने अपनी आंखो से नहीं देखा था। इसे देखकर मेरा अंतःकरण विचलित सा हो गया। मेरी इच्छा होने लगी कि आज इस शुभ दिन पर यह अदमी यहां से चला जाय, तो अच्छा हो।

मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर एक जरूरी काम है। मैं उसी में लगा हुआ हूं, आज तुम जाओ।"

सुनते ही वह जाने को तैयार हुआ, लेकिन फिर दरवाजे के पास जा खड़ा हुआ और कुछ संकोच से भर कर बोला, "एक बार खोकी को नहीं देख सकता क्या?"

शायद उसके मन में यही धारणा थी कि मिनी अभी तक वैसी ही बनी हुई है। या उसने सोंचा था कि मिनी आज भी वैसे ही पहले की तरह 'काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला' पुकारती हुई भागती हुई आ जायेगी और उसकी हंसी भरी अद्भुत बातों में किसी तरह का कोई फर्क नहीं आयेगा। यहां तक की पहले की मित्रता की याद कर वह एक पिटारी अंगूर और एक कागज के दोने में थोड़ा किशमिश-बादाम शायद किसी अपने वतनी दोस्त से मांग-मूंग कर ले आया था। उसकी पहले वाली झोली उसके पास नहीं थी।

मैंने कहा, "आज घर पर काम है। आज किसी से मुलाकात न हो सकेगी।"

वह कुछ उदास सा हो गया। स्तब्ध खड़ा मेरी ओर एकटक देखता रहा, फिर सलाम बाबू कहकर दरवाजे से बाहर निकल गया।

मेरे हृदय में एक टीस सी उठी। सोंच रहा था कि उसे बुला लूं कि देखा वह खुद ही चला आ रहा है।

नजदीक आकर उसने कहा, " ये अंगूर किशमिश और बादाम खोखी के लिये लाया हूं, उसको दे दीजियेगा।"

सब लेकर मैंने दाम देना चाहा, तो उसने एकाएक मेरा हांथ पकड़ लिया, कहा, "आपकी मेहरबानी है बाबू, हमेशा याद रहेगी। मुझे पैसा न दें...। बाबू, जैसी तुम्हारी लड़की है, वैसी मेरी भी एक लड़की है वतन में। मैं उसकी याद कर तुम्हारी खोखी के लिये थोड़ा सा मेवा हांथ में लेकर चला आता था। मैं यहां कोई सौदा बेचने नहीं आता।"
इतना कहकर उसने अपने ढीले ढाले कुर्ते के अन्दर हांथ डालकर एक मैला सा कागज निकाला और बड़े जतन से उसकी तहें खोलकर दोनों हांथ से उसे मेज पर फैला दिया।

मैंने देखा, कागज पर एक नन्हें से हांथ के पंजे की छाप है। फोटो नहीं , तैल चित्र नहीं, सिर्फ हथेली में थोड़ी सी कालिख लगाकर उसी का निशान ले लिया गया है। बेटी की इस नन्ही सी याद को छाती से लगाये रहमान हर साल कलकत्ता की गलियों में मेवा बेचने आता था, जैसे उस नाजुक नन्हें हांथ का स्पर्श उसके विछोह से भरे चौड़े सीने में अमृत घोले रहता था।

देखकर मेरी आंखे भर आईं। फिर मैं यह भूल गया कि वह एक काबुली मेवे वाला है और मैं किसी ऊंचे घराने का बंगाली। तब मैं यह अनुभव करने लगा कि जो वह है, वही मैं भी हूं। वह भी बाप है और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी नन्ही पार्वती के हांथों की निशानी ने ही मेरी मिनी की याद दिला दी। मैंने उसी वक्त मिनी को बाहर बुलवाया। घर में इस पर बड़ी आपत्ति की गई, पर मैंने एक न सुनी। ब्याह की लाल बनारसी साड़ी पहने, माथे पर चन्दन की अल्पना सजाये दुल्हन बनी मिनी लाज से भरी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसे देखकर काबुली पहले तो सकपका सा गया, अपनी पुरानी बातें दोहरा न सका। अंत में हंसकर बोला, "खोखी तुम ससुराल जाओगी?"

मिनी अब ससुराल शब्द का मतलब समझती है। उससे पहले की तरह जवाब देते न बना। रहमान का सवाल सुन शर्म से लाल हो, मुंह फेरकर खड़ी हो गई। काबुली से मिनी की पहले दिन की मुलाकात मुझे याद हो आई। मन न जाने कैसा व्यथिथ हो उठा।

मिनी के चले जाने के बाद एक लंबी सांस लेकर रहमान वहीं जमीन पर बैठ गया। अचानक उसके मन में एक बात साफ हो गई कि उसकी लड़की भी इस बीच इतनी ही बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे नये ढंग से बात चीत करनी पड़ेगी। वह उसे फिर से पहले वाले रूप में नहीं पायेगा। इस आठ वर्षों में न जाने उसका क्या हुआ होगा। सवेरे के वक्त सर्दियों की उजली कोमल धूप में शहनाई बजने लगी और कलकत्ता की एक गली में बैठा हुआ रहमान अफगानिस्तान के मेरु पर्वतों का दृष्य देखने लगा।

मैंने उसे एक बड़ा नोट निकालकर दिया, कहा, "तुम अपने वतन अपनी बेटी के पास चले जाओ। तुम दोनों के मिलन-सुख से मेरी मिनी का कल्याण होगा।"

यह रुपया दान करने के बाद मुझे विवाहोत्सव की दो-चार चीज़ें कम कर देनी पड़ीं। मन में जैसी इच्छा थी उस तरह रोशनी नहीं कर सका। किले का अंग्रेजी बैंड भी नहीं मंगा पाया। घर में औरतें बड़ा असन्तोष प्रकट करने लगीं, लेकिन मंगल ज्योति में मेरा यह शुभ-आयोजन दमक उठा।